लोकसंगीत की शुद्ध परंपरा को आधुनिक प्रस्तुति के साथ जीवंत बनाए रखने वाली चर्चित लोकगायिका ममता शर्मा इन दिनों श्रोताओं की पहली पसंद बनी हुई हैं। बनारस की सांस्कृतिक चेतना से रचा-बसा उनका स्वर लोक और शास्त्रीय संगीत के दुर्लभ संतुलन का सशक्त उदाहरण है।
परंपरा से उपजा संगीत-सफर
ममता शर्मा बताती हैं कि उनका संगीत-सफर किसी पूर्व नियोजित योजना का परिणाम नहीं, बल्कि पारिवारिक संस्कारों की देन है। उनके दादाजी पंडित ताराचंद जैतले जी शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि रखते थे। बचपन में उनके सान्निध्य ने ही संगीत के बीज बो दिए और बहुत छोटी उम्र से लोक व शास्त्रीय संगीत उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया।
बनारस: सुर-साधना की आत्मा
बनारस में जन्मी और पली-बढ़ी ममता शर्मा के स्वर में काशी की सांस्कृतिक चेतना स्वाभाविक रूप से समाई है। कजरी, चैती और लोकधुनें उनके गायन की पहचान हैं। उनके शब्दों में, “बनारस केवल मेरी जन्मभूमि नहीं, मेरी सुर-साधना की आत्मा है।”
गुरु-परंपरा का सशक्त आधार
उन्हें बनारस घराने के जलपा गुरुजी से प्रारंभिक मार्गदर्शन मिला, जिसके बाद पद्मभूषण श्रीमती गिरिजा देवी जी की शिष्या बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दोनों गुरुओं से उन्हें शास्त्रीय अनुशासन के साथ लोकभाव की गहराई समझने का अवसर मिला यही उनके संगीत का आधार स्तंभ है।
लोकगीतों की कालजयी शक्ति
ममता शर्मा मानती हैं कि लोकगीत आम जनजीवन की भावनाओं—सुख-दुख, ऋतु, प्रेम और संघर्ष—को सहजता से स्वर देते हैं। यही कारण है कि समय बदलने पर भी लोकगीत कभी पुराने नहीं पड़ते।
परंपरा और आधुनिकता का संतुलन
आज की चुनौती पर वे कहती हैं कि लोकसंगीत की शुद्धता बनाए रखते हुए उसे नए माध्यमों तक पहुँचाना आवश्यक है। प्रस्तुति और तकनीक आधुनिक हो सकती है,लेकिन लोकसंगीत की आत्मा से समझौता नहीं होना चाहिए। ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन जैसे राष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति सराहनीय है।

लोकसंगीत की विरासत और आधुनिकता का अद्भुत संगम : ममता शर्मा